The Journey Begins

Welcome and Thanks for joining me…..

The world doesn’t need to be multilingual to other’s. Because, Only the language of love and humanity is enough to make understand anything to anyone.

……..Suryaa

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कृष्ण और जन्माष्टमी

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥

हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ ॥

भगवान श्री कृष्ण ने अपनी उत्पत्ति को स्वयं के शब्दों में कुछ यूँ समझाया है।

जन्माष्टमी केवल भगवान के अवतरण का महोत्सव नहीं है, त्यौहार मात्र नहीं है। जन्माष्टमी अन्धकार के युग का सर्वनाश और प्रकाश के युग के प्रारम्भ को दर्शाता है। कृष्ण बहुआयामी हैं। कृष्ण मिटटी भी खाते हैं, कृष्ण बांसुरी भी बजाते हैं, कृष्ण कभी गोवर्धन उठाते हैं, कभी कृष्ण उपदेश भी देते हैं तो कभी कृष्ण सुदर्शन भी धारण करतें हैं। कृष्ण स्वयं में एक युग हैं, ज्ञान का सागर हैं।

कृष्ण कभी यशोदा नंदन हैं, कभी सुदामा के सखा ,द्रौपदी के रक्षक, तो कभी राधा का पावन प्रेम , सब कुछ है कृष्ण में या ये कहना सही होगा सब कुछ कृष्ण से हीं है।

जन्माष्टमी का पर्व हिन्दू धर्म का खास पर्व है, इस दिन भगवान विष्णु अपने आठवें अवतारकृष्णके रूप में अवतरित हुए थे। माँ यशोदा के कोंख से कारागृह में कंस वध को संकल्पित होकर उन्होंने जन्म लिया था और वध उपरांत मथुरा नगरी का उद्धार किया था।

जन्माष्टमी के पावन पर्व पर लोग पूरे दिन व्रत रखते हैं और कान्हा जी का जन्मदिन मनाते हैं। सभी मंदिरों में इस दिन 12 बजे भगवान श्री कृष्ण का जन्म करते हैं , इस दिन घरों में तरहतरह के पंचामृत, पंजीरी, पाग, सिठौरा समेत कई पकवानों का भोग श्री कृष्ण को लगाया जाता है। भारत में हिन्दू धर्म के लोग अपनीअपनी रीतिरिवाज से जन्माष्टमी को मनाते हैं। इस दिन मंदिरों में सुंदर झांकियां भी सजती है जिन्हें देखने के लिए भीड़ उमड़ती हैं यही नहीं लोग अपने बालगोपालों को भगवान श्री कृष्ण के वेष में सजाते हैं।

कृष्ण वसुदेव और देवकी की 8वीं संतान थे। मथुरा के कारावास में उनका जन्म हुआ था और गोकुल में उनका लालन पालन हुआ था। यशोदा और नन्द उनके पालक माता पिता थे। उनका बचपन गोकुल में व्यतित हुआ। बाल्य अवस्था में ही उन्होंने बड़े बड़े कार्य किये जो किसी सामान्य मनुष्य के लिए सम्भव नहीं थे। मथुरा में मामा कंस का वध किया। सौराष्ट्र में द्वारका नगरी की स्थापना की और वहाँ अपना राज्य बसाया। बाद में महाभारत में नायक बन पांडवों की रक्षा की और मार्ग भी दिखाया।

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इल्म…

ग़र जो ज़रा भी इल्म होती तुम्हें, बातों को समझने की।
तो शायद! यूँ ना दर-बदर पूछे फ़िरते कि बता, आख़िर गलती क्या थी मेरी?

अस्मत-भेदन

मेरी ये कविता उनको समर्पित जिन्होने तथाकथित सामाजिक लोग(दरिंदे) द्वारा खुद पर की गयी बर्बरता को झेला, उसे अपने जीवन की सफलता की सीढ़ी के तौर पर उपयोग करने वाले कभी ना उठ खड़े होने वाले गिरे लोग को झेला, न्याय के प्रति लोगों के असंवेदनशीलता को झेला और आज भी झेल रही हैं।
उन सोती हुई समाज को भी समर्पित जो ख़ुद पर अत्याचार होने के बाद जागने का इंतज़ार करतीं हैं।

अस्मत-भेदन

एक बलात्कार हुआ, और फिर! बार-बार हुआ।
कभी गलियों में,कभी कचहरी में,कभी जनपथ पर,
तो कभी इंडिया-गेट की चौखट पर।
अस्मत-भेदन का खेल तो बस यूँ ही सरेबाज़ार हुआ।

फिर से! लूटी गयी उसकी अस्मत,
कुछ, कैंडल-मार्च के व्यंग में फंस,
वो फिर से ज़ार-ज़ार हुआ।

न जाने क्यूँ ये बर्बरता बस, यूँ ही निर्भीक जारी है।
शायद इसके पनपने में कहीं, अपनी भी हिस्सेदारी है।

क्यूंकि हम स्वार्थी युवा हैं, देश के खोखले भविष्य।
याद हमे है सब कुछ, उस गुलामी का दंश उस बंटवारे का प्रपंच,
बस खुद के व्यर्थ व्यक्तित्व-निर्माण में फंस,
भूल जाते हैं मानवता का हर एक अंश।

हर अबला, मजबूर की पुकार,
नयी-पुरानी पर एक समान हर बार,
मदद की लगाती है गुहार।
पर उसी स्वार्थ-निर्माण के बोझ तले कुछ पल में ही,बिसरा दी जाती है हर बार।

सजीं हैं बर्बरताओं से बाजार यहाँ,
जिसे चुन, चाव से उठाते हैं खरीदार यहाँ।
और किसी रोज़ वो फिर से, तबियत से उछाली जातीं हैं, और अंदर ही अंदर उनकी बोली भी लगा ली जाती है।

फिर! खेल शुरू होता है अस्मत-भेदन का, कहाँ?

वहीँ! कभी जनपथ पर, कभी प्रेस-कोंफ्रेंसेस में,
कभी विद्यालय के प्रांगण में, कभी दूर उस मायानगरी में, तो कभी, न्यायिक कोर्ट-कचहरी में।
किन-किन का लूँ मैं नाम यहाँ,
अस्मत-भेदन का खेल यहाँ बस यूँ ही निरंतर जारी है, इस बर्बरता के खेल में सबकी, अपनी-अपनी ठेकेदारी है।

बहुत हुआ! अब बंद करो! अपमानों का सहना,
मष्तिष्क-बेरियां तोर अब सुन लो एक पल,
क्या है उन अबलाओं का कहना।

मैं तो अब रही नहीं पर मेरे हर विचार अमर हैं। और तुमसे, वो मैंने आस जो की थी, उन आशाओं के हर तार अमर हैं।
इक मात्र निवेदन है तुमसे, मुझपर हर गुज़रे वार का न्याय मिले, टूटे मेरे उन माँ-बापू को जीने का फिर कोई सार मिले।

बस आशाएं वो मेरी न्याय की, फिर! अबकी ना हारी जाए,
हम मज़लूमों की फेहरिस्त में कोई, अब और नाम ना जुड़ने पाए।…..

………….. Suryaa🙏

लोग, नइंसाफी और असंवेदनशीलता…

ये मेरी सोंच और बेचैनी आपके ग़ौर करने लायक, शब्द के रूप में। लोगों के संवेदनहीनता को देखते हुए कुछ बड़े ही विनाशकारी और भयावह घटनाओं के प्रति शायद हर दिन घटने वाली। विचार जरूर साझा करियेगा।🙏

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पता नहीं लोग कब इंसान बन, सच के लिए साथ खड़े हो बोलेंगे। कब हर गुज़री नाइंसाफी को एक हीं तराजू में तोलेंगे। हर बार उठती तो है आवाज़, मगर कोई रूह नहीं बसती उनमें। मुर्दे से कहीं ज्यादा मरी।

क्यूँकि किसी ने अपना सि‍यासती भविष्य देखा उस “असिफ़ा”, में तो कइयों ने “निर्भया” में खुद को मंजिल तक पहुँचाने वाली सीढ़ी देखी। फ़िर बिसरा दी गयी अगली स्वार्थपूरक मुद्दे तक। और आज “ट्विं‍कल” पर गुज़री बर्बरता लोगों को फिजूल लग रही है। क्या मतलब रोज़ की बात है, कुछ फायदा नहीं होना इससे अपना इस बार। लोगों को उनके मुताबिक सब मिला, मगर इन मासूमों को इन लोगों के बादौलत ग़र मिलता आ रहा है तो वो है सिर्फ़ नाइंसाफी।

काश! एक बार ग़ौर किया होता तो उनकी बेबसी दिखती, उनके जख्म दिखते, उनके दर्द महसूस होते तुम्हें। मगर क्या फर्क पड़ता है कौन से अपने थे। मग़र जो आज इनपर बीती है न, वो जब तुम पर बीतेगी तब समझ आएगा, क्यूंकि हर कर्म खुद पर लौटता है।

बस! आखिरी मौका है, ख़ुद के गिरने से पहले उठ जाओ। जो इन पर बीती है वो तुम्हारे किसी अपने पर ना बीते क्यूंकि, हर किसी का कोई अज़ीज़ तो होता हीं है। खड़े होना सीखो निःस्वार्थ किसी के इंसाफ के लिए। क्यूँकि टाईम सबका आता है, अच्छा या बुरा।
🙏

“देशभक्ति” ज़िम्मेदारी या ज़बरदस्ती।…

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शहीदों के मज़ारों पे लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पे मिटने वालों का बाकी यही निशाँ होगा।

शहीद अशफ़ाक़उल्ला खान ने ये शायरी शायद यही सोंच कर लिखी होगी की आने वाले समय में शायद हम नहीं होंगे, हमारे बाद न जाने कई पीढ़ियां आएंगी कई पीढ़ियां जाएंगी मगर कुछ हमेशा रहेगी तो वो होगी इस वतन की आज़ादी और इसे बरक़रार रखने के लिए खुद में ज्वालालपट संजोए देशभक्ति की मशाल। जिसे सब मिलकर साथ जलाए रखेंगे। मगर! वर्तमान समय में ये कुछ धूमिल सी पड़ती दिखाई पर रही है।

आखिर क्या कारण है?

बीते कुछ समय से देश में एक अजीब सा मुद्दा चर्चे में है, जिसे कभी होना ही नहीं चाहिए था। खैर!

कुछ लोगों का मानना है, की देशभक्ति अपनीअपनी सोंच है। कोई ज़बरदस्ती का सौदा नहीं और इसे उनपर ज़बरदस्ती थोपा रहा है। कभीकभी तो ऐसे भी संवाद सुनने को मिलते हैं…..

राष्ट्रीय ध्वज फहराना जरूरी है क्या?’, ‘राष्ट्रीय गान के समय मैं ज़बरदस्ती खड़ा क्यों होऊं।‘, ‘भारत माता की जय क्यों बोलूं।’, ‘हमारे संसथान का खुद का झंडा है हम राष्ट्रीय ध्वज क्यों फहराएं और इससे हमारे शाशनिकप्रबंधन में कठिनाई आती है।

हाँ! एक और चीज़ है जो बहुत सुनने में आ रही है अतिराष्ट्रवाद‘(हाइपरनॅशनलिस्म), अगर आप हर समय देशभक्ति की बात करते हैं या फिर देश की भलाई के बारे में सोंचते हैं या गलत चीज़ों के विरुद्ध मुंह खोलते हैं तो आप इस श्रेणी में आते हैं, अपशब्द के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है, आप अछूत बन जाते हैं। तो देशभक्ति व्यक्त करने के लिए भी एक मानक तय किया गया है, पता नहीं क्या और शायद जिन्होंने तय किया है उन्हें भी नहीं पता? मगर आप इसके दायरे से बाहर नहीं जा सकते। और अब कुछ ज्यादा ही हो चुका है।

ये सब सुनकर हंसी भी आती है और गुस्सा भी। मगर! जब मैंने इन चीज़ों के पीछे के कारणों को जानना शुरू किया, तो कुछ तथ्य सामने आये वो हैं अज्ञानता और झांसे में आना। आपको लगेगा ये कैसे कारण हैं, मगर वास्तव में यही कारण हैं। अज्ञानता का ये मतलब नहीं की हम अनपढ़ हैं बिलकुल नहीं, परन्तु इनके पीछे पढ़ेलिखे वर्ग भारी योगदान है। बल्कि इस विषय में अनपढ़ लोग ज्यादा समझ रखते हैं।

क्योंकि हमें पता ही नहीं की देश की वास्तविकता क्या है, स्वतंत्र होना क्या है, इसकी प्रभुता क्या है। हमें लगता है हम इक्कीसवी सदी में में जी रहे है, बहुत तरक्की कर ली है हम ही सब कुछ हैं देशभक्ति कुछ नहीं। परन्तु ऐसा नहीं है सोंचने की आवश्यकता है, जब हम अधीन थे तो हमे कुछ भी करने की आज़ादी नहीं थी, सौ साल हम पर क्रूर हुकूमत ने राज किया जहाँ हमे अभिव्यक्ति की आज़ादी तक नहीं थी। मगर आज भी कइयों को ऐसा लगता है खैर ये मुद्दा दूसरा है इसे किसी और ब्लॉग में उठाऊंगा। उन देशभक्तों के सौ साल तक चले निरंतर बलिदान और अखंड देशभक्ति मशाल का परिणाम है ये आज़ादी जिसे पाकर हम इसकी प्रभुता भूल गए हैं और इसे ही बुराभला अपशब्द कहे फिरते हैं। शायद हम भूल गए हैं जब तक ये धरती अस्तित्व में है तभी तक ही हमारी ज़िंदगी हमारी है। तो देशभक्ति सर्वोपरि है और इसकी कोई सीमा नहीं।

लोग दूसरों के झांसे में खूब आते हैं, इतनी भी सोंचने की फुर्सत नहीं की कौन गलत है कौन सही। बस भेंड़ चल में हैं चल देते हैं, हाँ! परन्तु टिप्पणी करने के लिए पूरा समय है। कुछ साल पहले की घटना है आप सब को पता होगा, देश के राष्ट्रीय संसथान (जे. एन. यु.) में कुछ नारे लगते है, भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह..“, “भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी..“, “अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं तेरे कातिल ज़िंदा हैं.. बड़ी भीड़ खरी थी नारों के समर्थन में कुछ संसथान के आला लोग भी थे। उस असंवैधानिक, राष्ट्रद्रोही नारों में ऐसी क्या सचाई दिखी ऐसा क्या राष्ट्र हित दिखा जो युवाओं की भीड़ समर्थन को खरी हो गयी। उनमे से किसी ने भी ये सोंचा की किसके टुकड़े होने की बात कर रहे हैं, किसकी बर्बादी की बात की जा रही है, कौन है ये अफ़ज़ल आखिर क्यों इसे देश की सेना ने पकड़ा क्यों इसे फांसी की संगीन सजा दी देश के प्रमुख न्यायलय ने और ये कौन है जो ये नारे लगा रहा है। नहीं बिलकुल भी नहीं, अगर सोंच लिया होता तो शायद समझ में आ जाता की ये इसी भारत के टुकड़े और बर्बाद होने की बात कर रहे हैं, जहाँ मैंने जन्म लिया, जहाँ मैं बड़ा हुआ, जिसने मुझे कुछ करने के काबिल बनने का अवसर दिया जहाँ मैं अपने परिवार के साथ सुकून से ज़िंदगी बिता रहा हूँ, हर शाम को चाय की चुस्की लेता हूँ अपने परिवार के साथ कोई मुझे रोकने वाला नहीं है मैं आज़ाद हूँ। ये उस भारत के लिए अपशब्द कह रहा है! ये तो देशद्रोही है! इसे यहाँ नहीं होना चाहिए। परन्तु ऐसा हुआ नहीं, नेता जो बनना है सबकोउद्देश्यहीन।

कुछ लोग लीपापोती कर लोगों के देशद्रोही होने का कारण उनके हालात, गरीबी को बता देते हैं, अगर ऐसा होता तो देश का हर गरीब आतंकी होता। आजकल ऐसे लोग अक्सर हमें समाचार चैनलों पर उटपटांग दलील देते हुए और देशद्रोहियों की वकालत करते दिखाई दे जाते हैं, ये दीमक हैं इस देश के लिए और युवाओं को गलत मार्ग पर भटकाने के प्रमुख कारण। अगर कोई किसी के बहकावे में या किसी भी कारण से गलत मार्ग पर है भी तो उसकी अंतरात्मा उसकी देशभक्ति जो उसके अंदर जन्म से है उसे वापस सही मार्ग पर लौटने को मजबूर कर ही देती है। और ये उसके अंदर से किसी भी परिस्थिति में नहीं जाती अगर उसके अंदर रही है।

और इसका साक्षात् उदहारण हैं शहीद [लांस-नाइक] नज़ीर अहमद वानीजो की 2004 तक आतंकी संगठन से जुड़े थे, बाद में उन्होंने आत्मसमर्पण किया और देश की सेवा में जुट गए। वो पिछले साल नवंबर 2018 में कश्मीर में हुए आतंकीयो के खिलाफ कार्यवाही में शामिल थे, उन्होंने बड़े शौर्य और अदम्य साहस का परिचय दिया मगर इस कार्यवाही के दौरान वो वीरगति को प्राप्त हुए, उनके इस अदम्य साहस और पराक्रम के कारण उन्हें इस 70वे गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति द्वारा अशोक चक्र से सम्मानित किया जाएगा।

तो इनकी कहानी घाटी के और देश के हर युवा के लिए प्रेरणाश्रोत है, कुछ भी हो अपने अंदर के देशप्रेम, देशभक्ति को ख़त्म मत होने दो वो तुम्हे भटकने नहीं देगा।

तो देशप्रेम या देशभक्ति कोई ज़बरदस्तीकी चीज़ नहीं है ये जिम्मेदारीहै जो इस धरती पर जन्म लेने के साथ ही हमसे जुड़ जाती है। जिसे समझा उन क्रांतिकारियों ने जिन्होंने जाने कितनी कुर्बानीया दीं हमारे वतन की आज़ादी के लिए हमारे लिए, जिसे बरक़रार रखने की एक बड़ी जिम्मेदारी हमारी सेना उठाये हुई है, तो ये हमारा फ़र्ज़ है हमारी भी जवाबदेही है और ज़िम्मेदारी है की हम अपने इस मातृभूमि की प्रभुता बरक़रार रखें देश के प्रति ईमानदार रहकर, देशभक्ति दिखा कर जो की हमारे कार्य से दिखेगी खूब बढ़ चढ़ कर, ये व्यक्त करने की चीज़ है,अपने अंदर दबा कर रखने की चीज़ नहीं। और अगर भविष्य में अगर कोई आपको अतिराष्ट्रवादी(हायपरनेशनलिस्ट) कह कर सम्बोधित करे तो समझियेगा आप बिलकुल सही मशाल थामें हैं, जिसे आपको हमेशा जलाए रखना है। क्योंकि जब तक ये देश है, हम हैं, सब है। और देश सर्वोपरि है।

“जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”||

अर्थात् – जननी (माता) और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी श्रेष्ठ एवं महान है।

आज्ञा।🙏

जय हिन्द, वन्दे मातरम, भारत माता की जय

गणतंत्र दिवस 🇮🇳की हार्दिक शुभकामनाएं।….