The Journey Begins

Welcome and Thanks for joining me…..

The world doesn’t need to be multilingual to other’s. Because, Only the language of love and humanity is enough to make understand anything to anyone.

……..Suryaa

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Rituals in Religions…

Rituals in Religions are like ‘Soul and DNA’ of human body, which not only give it shape and gesture but also give it a distinct identity which makes it similar from core but different from it’s appearances.

~Suryaa~

Liebster Award

Liebster

I am so happy to announce that I have been nominated for the Liebster Award by Rachana Tripathi mam This is the first time I have been nominated for any blogger award since I have started and therefore it’s quite an honor for a new blogger like me.

So, I am very grateful to Rachana Tripathi mam and thanking her from the bottom of my heart that she considered and nominated my name for this glorious award.

 

About the Liebster Award:

This award is meant as an instrument to encourage and mentor new blogger’s. From The Global Aussie: “The earliest case of the award goes as far back as 2011. Liebster in German means sweetest, kindest, nicest, dearest, beloved, lovely, pleasant, valued, cute, endearing, and welcome.” The award initially focused on blogger’s with less than 2000 followers, but as its popularity burgeoned, this number has gone down to 200.

Questions for nominees:

  1. What love means in your life?
  2. Most awaited dream of your life?
  3. Thing you hate and love most in this world and why?
  4. Thing you hate most of human nature and why?
  5. which relation is closest to your heart?
  6. Favorite movie?
  7. Do you think country is above all. why?
  8. what is your strength?
  9. You can’t live without thing of yours?
  10. One act of yours which you admires most?
  11. Something you want to change in you?

My answers to the 11 questions asked by Rachana Tripathi mam:

1.What do you admire the most about yourself 

ans- My Genuinity and never give-up thing.

2.What do you think about rituals in religion?

ans- Rituals in religion are like ‘Soul and DNA’ of human body, which not only give it shape and gesture but also give it a distinct identity which makes it similar from core but different from appearance.

3.What do you think is your extraordinary talent?

ans- Maybe my, Bringing a smile on the faces of others, even in their harsh moment.

4.Why is it extraordinary for you?

ans- There can not be any other thing that gives a lot of happiness and peace to seeing a smile on the faces of others.

5.Favorite movie and reasons behind your choice.

ans- ‘Rockstar’ there are lots of love story movies but this only in which i have found that very genuine peace and soul of love.

6.Best place for tour.

ans- Kerala and ladakh.

7.Favourite actor.

ans- Ranbir kapoor and Rajesh khanna.

8.What is the most important aspect of one’s life?

ans- Having a successful and happy life to live.

9.What would you like to have the most- Strength, generosity or intelligence?

ans- Generosity, because this is the only thing which let you welcome the other two things Strength & Intelligence in you purely.

10.Which person does inspire you the most?

ans- The person who admires/treats others same like he treats himself.

11.What do you think about oldage homes?

ans- It should not be in existence. because a house become home only under the shed of the elders.

11 Random words about myself:

  • Do everything with passion.
  • Respect my elders
  • Occasionally lazy
  • Don’t want to hurt anyone by any means.
  • Love listening songs.
  • Writing poems and shayaries are my hobby.
  • Religious & patriotic.
  • Gamer.
  • Fun loving.
  • Emotional.
  • Love football.

Rules for the Awards :

  • Thank the blogger who nominated you.
  • Make a post to show your award.
  • Tell about Liebster awards and its rules.
  • Answer the 11 questions asked by your nominator.
  • Describe yourself in 11 sentences.
  • Nominate 10 other bloggers of your choice.
  • Inform them about their nomination.

Names of  bloggers whom i have nominated :

  1. Akshaya Thulasi
  2. Manisha Nandan
  3. Ayush Kumar
  4. Vivek Anand
  5. Vikas Kumar
  6. The A.D. Diary
  7. Vikash Kumar
  8. Makkhan
  9. Aniket Verma
  10. Indira

रक्ताभिषेक

मेरी यह कविता मातृभूमि और इसके महान सपूतों(सैनिकों) और उनकी वीरता को समर्पित है। जिनके कारण हीं हम अपने घरों में अपने परिवार के साथ सुरक्षित और खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

यह मेरी कविता बहादुर सैनिकों के उस अदम्य साहस और अद्वितीय पराक्रम (सर्जिकल स्ट्राइक) पर प्रस्तुत है, जिससे उन्होंने दुश्मन के घर में घुसकर उनके कयरतापूर्ण किए गए हमले में वीरगति को प्राप्त हुए अपने साथियों का और मातृभूमि को हुए अपूर्ण क्षति का बदला लिया।

“जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”||

अर्थात् – जननी (माता) और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी श्रेष्ठ एवं महान है।

रक्ताभिषेक-

इनके बढ़ते कदमों के टापों से अरि की छाती थर्राएगी,

बस सोंच निरंतर उनको हीं तेरी, प्राण पखेरू हो जाएगी।

इनके दयाभाव के बदले जो तुमने बर्बरता दिखलाया है,

गलती कर दी अबकी तूने, अब समय महाकाल का आया है।

सिर होंगे ना धर पे अब ना नारों लहू का दौड़ होगा,

उन शूरों के हथियारों में महाराणा प्रताप का शौर्य होगा।

तू काँपेगा थर्राएगा अपनी जीवन की भिक्षा चाहेगा,

पर विवश-मात्र होकर तू बस, कुछ भी ना कर पाएगा।

प्रण है अबकी, लहू-नदी की जल से अभिषेक महाकाल का होगा,

ना तू होगा और ना तेरे वंश का अक्षर-मात्र भी होगा।

ना तू होगा और ना तेरे वंश का अक्षर-मात्र भी होगा।।

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इस कविता पर आपके सुझाव और टिप्पणियों का आदारपूर्ण स्वागत है। ….. 🙏धन्यवाद

चाहा था कभी….

चाहा था कभी….

तू आ लिपटे आगोश में मेरी, मैं चूम लूं तेरे माथे को,

तू मेरी शीरीन बन जाए और मैं तेरा फ़रहाद बनूँ।

पर मंज़ूर नहीं था वक़्त को ये, तू बन के रहे मेरा अपना,

तू बन गयी मेरे लिए जैसे हो कोई, परियों वाला सपना।

चाहा था कभी….

तू बस जाए बनकर रूह मेरी, मैं उसका अनहद-नाद बनूँ ,

तू राधा मेरी बन जाए, मैं तेरे अमर-प्रेम का गाथ बनूँ।

फिर बस जाऊं तेरे रोम-रोम में, प्रेम-सुधा सम्मान बनूँ।

पर इक अनदेखी अंगार ने फूँका, मेरा रैन-बसेरा अपना,

तू बन गयी मेरे लिए जैसे हो कोई, परियों वाला सपना।

चाहा था कभी….

इस अनजान सफर में, मैं तेरे हाथों का हाथ बनूँ,

तू बन जाए मेरी आशा मैं तेरा दृढ-विश्वास बनूँ।

मैं बन जाऊं फरमान कोई, तू उसकी अटल सत्य आज़ादी बन जाए,

फिर उड़ जाएं इस इश्क़-फलक में, कोई पिंजर-बद्ध न चाहे कर पाए।

पर सब खाख हुए, सब धुंआ हुआ,

मेरे सपनो का घरौंदा अपना,

जब जाना, पाया के खोटा था ये सिक्का हीं अपना।

और, तू रह गयी मेरे लिए बनकर, जैसे हो कोई परियों वाला सपना।

तू रह गयी मेरे लिए बनकर, जैसे हो कोई परियों वाला सपना।

—————-*—————🙏
*अनहद-नाद = अन्तरात्मा की ध्वनि, sound of inner soul.

ज़िन्दगी क्या है…

इस गतिमान सृष्टि में वास्तव में अगर किसी चीज़ का अस्तित्व है तो वो है जन्म और मृत्यु। और इन्हीं दोनों चीज़ों के मध्य में एक और चीज़ है जो वास्तव में भी है और अस्तित्व में भी और वो है ज़िन्दगी। लेकिन, पल भर के लिए भी क्या हम कभी सोचते हैं, कि वाकई में ज़िन्दगी अखिर चीज़ क्या है… नहीं! कभी नहीं!

बड़ी विडंबना है कि, जिस जिंदगी में जिस जिंदगी को हम जी रहे हैं उसी को जानने के लिए वक़्त नहीं है हमारे पास।

ये बड़ा सवाल है कि, जिस जिंदगी को हमने जिया बिना समझे, बिना जाने जिससे हमारा वजूद है, और ये भी नहीं पता कि इसका मूल क्या है, तो उस विधाता के दिए इस अमूल्य तोहफे को हमने व्यर्थ कर दिया, सार्थक ना कर सके।

तो इसे जानना, समझना बेहद जरूरी है।

इस संसार में जो कुछ भी चीज़ें मौजूद हैं उनका कोई ना कोई मूल आधार है, जिनके कारण वे अस्तित्व में हैं। जैसे- पेड़ अपनी जरों से, मनुष्य, पशु-पक्षी श्वास से, मकान नीव से, मालाएँ सूत्र से हर चीज़ अपने मूल अधार से ही अस्तित्व में हैं। और जरूरी नहीं है कि मूल आधार एक ही हो ज्यादा भी हो सकती हैं।

ठीक उसी प्रकार ज़िन्दगी भी अपनी मूल आधारों से हीं अस्तित्व में है, जिसे मैंने जाना है खुद से अब तक ज़िन्दगी को समझ कर मेहसूस करते हुए। इन आधारों को मैंने अपने स्तर पर अनुसंधान में पाया है, जिन्हें मैं अपनी कविता से आप सब के साथ साझा कर रहा हूँ।

जरूरी नहीं है कि ये इतने तक ही सीमित हों, और भी हो सकते हैं। आप अपने स्तर पर अनुसंधान करें और इस अद्वितीय महत्वपूर्ण सार को समझें और जानें।

मेरी इस रचना पर आपकी टिप्पणी और सुझाव का आदरपूर्ण स्वागत है।….

* ज़िन्दगी क्या है

ज़िन्दगी क्या है? इक ‘प्यार’ का एहसास है,

जैसे तपती धरा को बूँद की इक प्यास है।

अंजान बनकर मेहफ़ीलों में ढूं‍डते हैं अपनों को,

जैसे टूटी वृध्द आखें जागती हों सपनो को।

उन सपनों को पिरोने की ताक़त वास्तव है ज़िन्दगी।

ज़िन्दगी क्या है? इक ‘प्यार’ का एहसास है……

ज़िन्दगी क्या है? ‘इंसानियत’ का नाम है,

जैसे वृक्षों की जड़ें उनके लिए तो प्राण हैं।

बन बागी अपने ही जड़ों से ढूंढते हैं श्वास को,

कर बंद अन्तःद्वार खुद के और ढूं‍डते प्रकाश को।

धन्य कर दे खुद को तू जोड़ अपने मूल से,

कि, ये जड़ ही तेरी श्वास हैं और श्वास हीं है ज़िन्दगी।

ज़िन्दगी क्या है? ‘इंसानियत’ का नाम है……

ज़िन्दगी क्या है? ‘धर्म’ है,

जैसे मोतियों का मूल्य, तो केवल एक निर्मल सूत्र है।

सूत्रमाला जैसे टूटे मोतियां बिखरती हैं,

फ़िर कहाँ! कोई मूल्य उनका वो तो केवल मोती हैं।

मत करो खुद का परिवर्तन मोतियों में जान कर,

रोक दो ये धर्म टुकड़े कृष्ण और कुरआन पर,

क्योंकि वो भी कह गए हम भिन्न एक ज्ञान हैं।

ज़िन्दगी क्या है? ‘धर्म’ है……..

समन्वय इन तीन मूल का ही, ज़िन्दगी का अधार है,

जो ये तीन मूल ना हो तो, फ़िर ज़िन्दगी निराधार है।

ज़िन्दगी क्या है?…… 🙏